
ठेले-ढाबों से लेकर उद्योग तक पारंपरिक ईंधन की वापसी
नई दिल्ली। पश्चिम एशिया में बढ़ते तनाव और वैश्विक आपूर्ति श्रृंखला में आई बाधाओं का असर अब भारत की रसोई और छोटे कारोबारों तक पहुंचने लगा है। कई राज्यों में एलपीजी (LPG) की सप्लाई प्रभावित होने से होटल, रेस्तरां और सड़क किनारे ठेला लगाने वाले छोटे व्यापारियों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है।
छोटे कारोबारियों पर सबसे ज्यादा असर
गुजरात के अहमदाबाद में अंडा ठेला चलाने वाले अरविंदभाई महतो का कहना है कि गैस सिलेंडर न मिलने से उनका काम लगभग ठप हो गया है।
उन्होंने बताया,
“हमारा पूरा परिवार इसी ठेले पर निर्भर है। अगर कई दिन तक गैस नहीं मिली तो घर चलाना मुश्किल हो जाएगा।”
कई अन्य छोटे विक्रेताओं का भी कहना है कि गैस की कमी के कारण उन्हें कोयले और लकड़ी के चूल्हों का सहारा लेना पड़ रहा है।
काला बाज़ार में बढ़ीं कीमतें
व्यापारियों के अनुसार जहां पहले कमर्शियल गैस सिलेंडर ₹1600 से ₹1800 में मिल जाता था, वहीं अब अनौपचारिक बाजार में इसकी कीमत ₹3000 से ₹4500 तक पहुंच गई है। महंगी गैस के कारण छोटे व्यापारियों के लिए रोज़मर्रा का कारोबार चलाना मुश्किल हो गया है।
कोयले के चूल्हों पर लौटती रसोई
गैस की कमी के बीच कई जगह कोयले और लकड़ी के चूल्हों का इस्तेमाल फिर से बढ़ने लगा है। हालांकि इन पर खाना बनने में अधिक समय लगता है, लेकिन संकट के समय यही विकल्प छोटे कारोबारियों को काम बंद होने से बचा रहा है।
ऊर्जा संकट की आहट
ऊर्जा विशेषज्ञों के मुताबिक पश्चिम एशिया में जारी तनाव और समुद्री मार्गों में बाधा के कारण तेल और गैस की वैश्विक आपूर्ति प्रभावित हो रही है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात करता है, इसलिए अंतरराष्ट्रीय हालात का असर यहां जल्दी दिखाई देता है।
बैक-अप ऊर्जा के रूप में कोयला

विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे समय में कोयला एक महत्वपूर्ण बैक-अप ऊर्जा स्रोत के रूप में सामने आता है। बिजली उत्पादन से लेकर उद्योगों तक, कोयला लंबे समय से भारत की ऊर्जा सुरक्षा का आधार रहा है।
संतुलित ऊर्जा नीति की जरूरत
विशेषज्ञों का कहना है कि भविष्य में ऊर्जा संकट से बचने के लिए भारत को कोयला, गैस, तेल और नवीकरणीय ऊर्जा जैसे विभिन्न स्रोतों के संतुलित उपयोग पर ध्यान देना होगा।
फिलहाल छोटे व्यापारी और आम लोग इस उम्मीद में हैं कि गैस की सप्लाई जल्द सामान्य होगी।




