
राजनांदगांव, 27 नवंबर 2025।
शासकीय कमला देवी राठी महिला महाविद्यालय में बी.कॉम द्वितीय वर्ष के परिणामों ने कॉलेज की शिक्षा व्यवस्था पर गंभीर प्रश्न खड़े कर दिए हैं। सत्र 2024-25 में कुल 61 छात्राओं में से 49 छात्राओं को अंग्रेजी विषय में पूरक परीक्षा देनी पड़ी, और चौंकाने वाली बात यह कि इन 49 में से 48 छात्राएं पुनः फेल हो गईं।
छात्राओं का आरोप— पढ़ाया पुराना, पूछा नया पाठ्यक्रम छात्राओं ने आरोप लगाया कि कॉलेज में नया पाठ्यक्रम पढ़ाया ही नहीं गया, जबकि परीक्षा नए सिलेबस के आधार पर ली गई।
छात्राओं का कहना है—
“हम मेहनत करते रहे, लेकिन जो पढ़ाया ही नहीं गया, वह परीक्षा में पूछ लिया गया। हमारा पूरा साल बर्बाद हो गया।”
सूत्रों के अनुसार अंग्रेजी विभाग में एक स्थायी प्राध्यापक और एक जनभागीदारी व्याख्याता थीं। आरोप है कि स्थायी प्राध्यापक ने पूरे सत्र में नियमित कक्षाएं नहीं लीं। वहीं जनभागीदारी व्याख्याता ने पुराने पाठ्यक्रम पर पढ़ाई कराई, जबकि परीक्षा नए पाठ्यक्रम के आधार पर हुई आर्थिक रूप से कमजोर छात्राओं में गहरा आक्रोश कॉलेज में अध्ययनरत अधिकांश छात्राएं आर्थिक रूप से कमजोर परिवारों से आती हैं।
न पुस्तकें खरीदने की क्षमता, न कोचिंग का सहारा—ये छात्राएं पूरी तरह कॉलेज में दी जाने वाली पढ़ाई पर निर्भर रहती हैं। ऐसे में परिणामों ने उनके भविष्य पर बड़ा संकट खड़ा कर दिया है।
छात्राओं की प्रमुख मांगें
विशेष परीक्षा (स्पेशल एग्ज़ाम) की व्यवस्था पुनर्मूल्यांकन का विकल्प लापरवाह शिक्षकों पर अनुशासनात्मक कार्रवाई
युवा नेता ऋषि शास्त्री का बयान पूर्व छात्रसंघ अध्यक्ष एवं युवा नेता ऋषि शास्त्री ने मामले को अत्यंत गंभीर बताते हुए कहा—
“यह केवल एक विभाग की लापरवाही नहीं, बल्कि नई शिक्षा नीति की कमजोरियों को उजागर करने वाला उदाहरण है। यदि शिक्षण व्यवस्था पर ध्यान नहीं दिया गया तो छात्राओं का भविष्य अंधकारमय हो जाएगा। सरकार और विश्वविद्यालय तुरंत हस्तक्षेप करें और दोषियों पर कड़ी कार्रवाई करें।”
उठ रहे बड़े सवाल क्या कॉलेज की शिक्षा व्यवस्था सिर्फ औपचारिकता बनकर रह गई है?
जिम्मेदार शिक्षकों पर क्या कार्रवाई होगी?
विश्वविद्यालय इस प्रकरण पर क्या कदम उठाएगा?
क्या छात्राओं को पुनः पढ़ाई व परीक्षा का अवसर मिलेगा या उनका एक वर्ष व्यर्थ जाएगा?
यह पूरा मामला न सिर्फ महाविद्यालय प्रशासन, बल्कि उच्च शिक्षा विभाग और शिक्षा नीति की पारदर्शिता पर भी गंभीर प्रश्न खड़ा करता है।
छात्राओं और उनके परिवारों के लिए न्याय सुनिश्चित करना अब विश्वविद्यालय और सरकार की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है।




